Wednesday, June 26, 2024

साया

इंतजार में तड़पती रही, रूह भी बेकरार क्यों राहों में बिछे कांटे, मुझसे दूर मेरा प्यार क्यों

शेर

नीगाहें हर पल ढूंढें, साया तेरा हर ओर

दिल में लगी आग, बुझाने आया तू किस ओर चाँदनी रात में तन्हाई, तेरे बिन ना चैन आए सन्नाटे की आहट में, तेरी आवाज़ क्यों ना आए दिन गुज़रें और रातें, इंतजार में हैं ढलती यादों की परछाईं, आँखों में क्यूं हैं जलती हर मोड़ पर ढूँढा तुझे, हर गली और हर डगर तेरे बिन ये जिन्दगी, लगती है जैसे बसर

मकता:

' योगी' की यह गजल, दिल से निकली है पुकार
इंतजार की इन राहों में, कब होगी मुलाकात यार
योगेश ' योगी '

नयन

नयनों की भाषा में बात करें,  
शब्दों से आगे कुछ खास कहें।  
सागर की तरह गहरी हो बातें,  
दिल की गहराइयों से जज़्बात कहें।

कभी खामोशी से कहानी कहें,  
कभी आंसुओं से जुबां सजीव करें।  
नयनों की भाषा में लिखें शायरी,  
हर नजर में हो एक सफर फूल झरें।

कभी इश्क़ की मिठास हो उनमें,  
कभी दर्द की चुभन भी हो उनमें ।  
 चित्रकार की तरह हों मायने,  
नज़र सा नया अफसाना हो उनमें।
          योगेश योगी

Saturday, June 8, 2024

गलियाँ

 मेरे कुछ भाव शब्दों के साथ ज़िंदगी का एक नज़रिया पेश है -

विषय - गलियाँ
बुनती कहानी हर भीगी शाम,
चीखती दीवारें, जैसे
बीते लम्हों का विराम।
सिकुड़ती सांसें, जैसे
रुक-रुक कर चले
एक अनजाना पैगाम।
अंधेरी गुप्प गलियां, जैसे
अनकहे राज़ों का
सदियों से है मुकाम।
सुनी अंखियां, बोले सन्नाटे,
जैसे छुपे हुए जज्बात,
आंखों में है बयां इलजाम।
टूटी खिड़कियाँ, जैसे
अधूरी उम्मीदें,
किसी सपने का अंजाम।
बेजान लम्हे, जैसे
अधूरे अरमान,
दिल के किसी कोने में गुमनाम।
यह शहर की चुप्पी, जैसे
अनकही कहानियाँ,
हर गली का है अपना कुहराम।
- योगेश 'योगी'

Thursday, June 6, 2024

 हास्य रस के साथ कल की कहानी

कुर्सी देवी
तारीख चार को चुनाव परिणाम आएगा,
देश का भविष्य फिर से लिखा जाएगा।
नेताओं के छुट रहे पसीने,
टेम्परेचर हुआ जाता है हाइ,
हर कोई पूछे, "कितनी गर्मी है भाई?"
कहीं जीत की खुशी में ढोल बज रहे हैं,
तो कहीं मायूसी में चेहरे लटके हुए हैं।
नेता जी बोले, "ये जनता का प्यार है,"
पर सच तो ये है, कुर्सी का ही बुखार है।
वोटों की गिनती में सबकी जान अटकी,
गिन-गिन के वोट, सबके हाथ पक्के।
पान वाले ने कहा, "चाय फ्री में मिलेगी,"
तो चायवाले ने हंस कर कहा,
"नहीं भई, ये तो सियासत की चाल है,
टेलीविजन पर एंकर चिल्लाए,
"बड़ा ही रोमांचक खेल हो रहा है,"
कहीं जश्न की मिठाई बांटी जा रही,
तो कहीं ग़म में बिरयानी सुस्ता रही।
नेताओं की रैली में ट्रैफिक जाम हो गया,
टेम्परेचर से हर कोई परेशान हो गया।
कोई बोला, "जीत के बाद नेता मिलेंगे,"
दूसरा बोला, "बस बैनरों पर ही दिखेंगे।"
तारीख चार को चुनाव परिणाम आएगा,
देश का भविष्य फिर से लिखा जाएगा।
नेताओं के छुट रहे पसीने,
टेम्परेचर हुआ जाता है हाइ,
कहीं जीत की खुशी, तो कहीं मायूसी छाई।
- योगेश ' योगी '

 आज विश्व


पर्यावरण दिवस है,

अन्तस में पीड़ा है, हम धीमे धीमे बहुत कुछ खोते जा रहे है।
जागरूकता हेतु मैने आज ये चित्र विषय " तपिश"और भाव शब्द रचे हैं, समर्थन की चाह है, ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ।
**नदी की छाती पर रेत का बोझ**
**पहाड़ की पुकार में पत्थरों का शोर**
**पेड़ की शाखों में लकड़ी का दर्द**
**खेत की गोद में नकद की भूख**
उलीच ली रेत, खोद लिए पत्थर,
काट दिए पेड़, तोड़ दी मेड़।
रेत से पक्की सड़क, पत्थर से मकान,
लकड़ी के नक्काशीदार दरवाजे सजाकर,
अब भटक रहे हैं।
सूखे कुओं में झांकते,
रीती नदियों को ताकते,
लू के थपेड़ों में झाड़ियां खोजते,
बिना छाया के ही हो जाती सुबह से शाम।
गली-गली ढूंढ़ रहे हैं ऑक्सीजन,
फिर भी सब बर्तन खाली।
सोने के अंडे के लालच में,
मानव ने मुर्गी मार डाली।
**आसमान की ओर देखते हैं अब,**
**पर वहां भी बादलों का घर खाली।**
**धरती की छाती से निकलीं आहें,**
**पर उन आहों में भी गूंजती हैं सिर्फ़ ख़ामोशियाँ।**
**हरियाली के सपनों में उलझे,**
**अब भी हम समझ नहीं पाए,**
**कि इस दौलत की अंधी दौड़ में,**
**हमने क्या-क्या खो दिया, क्या-क्या गवां दिया।**
**नदी की लहरें रेत से दब गईं,**
**पहाड़ की चोटियां पत्थरों में बिखर गईं,**
**पेड़ों की छांव लकड़ी में जल गईं,**
**खेत की मिट्टी नकद में बह गईं।**
**अब हमें चाहिए, फिर से वो पानी,**
**नदी का मीठा, पहाड़ का सुकून,**
**पेड़ की छांव, खेत की सौंधी महक।**
**पर शायद अब, वो सपने ही रह गए हैं।**
**इस कड़वी सच्चाई में हम सभी हैं क़ैद,**
कब छूटेंगे तृष्णा से, जाने न भेद ,
गली-गली ढूंढ़ रहे हैं पानी,
फिर भी सब बर्तन खाली।
सोने के अंडे के लालच में,
मानव ने मुर्गी मार डाली।

Friday, May 31, 2024

यादें


दालान के नीचे छिपा सपना,
पुराने घर की सीलन से लिपटा,
मिट्टी का चूल्हा सिसक रहा,
धुआँ आँखों में बस गया है।

बुनी थी जो यादें, उन गलियों में,
वो अब भी बिखरी हैं सन्नाटों में,
कभी चूल्हे की आंच में तपतीं,
कभी सीलन की नमी में भटकतीं।

दरवाज़े की चरमराहट में,
बीते लम्हों की आहट है,
उन कोनों में गुज़रे दिनों की,
खामोशियों की बगावत है।

छत पर टपकता पानी कहता,
कहानियाँ उन पुरानी दीवारों की,
जहाँ हर ईंट पर लिखा है,
सपनों का हिसाब किताब।

दालान के नीचे छिपा सपना,
अब भी है वहीं कहीं दबा,
चूल्हे की राख में ढूंढ़ता,
वो बिछड़ा हुआ सिलसिला।

योगेश ' योगी' 

Friday, June 10, 2016

अनर्गल बस यूँ ही

1
for vb-
लगता है या तो गर्मी का कहर है या फिर ग्रुप की ना फिकर है।।
एक हम ही रिश्तों की अंगीठी में शब्दों की चिंगारी दे रहे है ।।
वरना किसे याद है अब इधर लौटना ।।
बहुत हताश हूँ , आप सबकी इस ख़ामोशी से ।।
समय मेरे पास भी थोडा है ।
अगर आपका इतना  कीमती है तो-योगी ☺
2
सुकूने खयाल हो ,अनबुझा सा सवाल हो।
अपना सा कोई पल,दुरी से भरा मलाल हो।-योगेश 'योगी'
3
Yogesh  'yogi': ये स्नेहसिक्त बिल्लोरी कजरारी अँखियाँ , लगता है हर अगली दिवार ,झरोखे से झांकती है मुझे । ये बिल्लोरी प्यारी सी अँखियाँ
4
Yogesh  'yogi': ये मीठी मधुर मुस्कान , बनाती मेरी मुखर जान।तड़प रहती तुझे देखने को,कब होगा न जाने मुझपर अहसान ।।
5
भीना सा अहसास हो,मेरी कहानी में खास हो।।
कैसे कह दूँ जुदा हो ,यंही हर वक्त आस पास हो।।
6
तेरी गहरी आँखों की गहराई में डूब जाउ । आ के तुझे ख्वाबों में गुनगुनाऊँ ।।
ॐ 
7
तेरे मेरे ये नेह तागे ..बुने हज़ारों चटख रंग संग पिया।।-योगी
8
हर्फों में से 'हुआ जो हुआ 'नहीं 'काश'लेते हैं।
हम ठंडी राख से भी पुराने गुलाब तलाश लेते हैं।।-योगेश 'योगी'
9
दिखता जो हर तरफ उजला और स्याह ।
महसूस हुआ और सुनी जो चर्चा ।।
पता नहीं क्या झूठ और कितना सच्चा ।-योगी
10
ऐ जिंदगी ,क्यूँ यकीं नहीं होता तू इत्ती पास भी है क्यूं इतनी दूर भी फिर।सांस कभी थमी सी आह भी उभर उभर की सिहर।।ये सजा है किस जुर्म की कि जिसे जिया पल पल वो एक पल भी न पा सका पलक सिर्फ राहें बस नहीं मंझिल उधर की इधर -योगी
11.

कि शाम जब ढलती है-
 तब अक्सर नारंगी लाल होती बदलियाँ और आकाश का अंतिम छोर
जो गहराता जाता है
और गहरा रंग और गहरा हो जाता है
नीड की और विश्राम को लौटते पक्षी
 गोधूलि से अटे रास्ते पे थके मजदुर और लौटते किसान
धीमी रौशनी से जगमगाते लट्टू
और शाम के खाने के बाद खिड़कियों से झांकती आँखे
बुझ चुके चूल्हों से उठता धुंआ
 खामोश होता जाता है चीखता शहर
इक रात आती है दबे पाँव
 आगोश में लेने निंदिया के साथ
के फिर होगी नई सुबह
फिर से चलना है
 अनवरत अनंत की और
ये असीमित यात्रा और आपसा साथ
क्या कहूँ क्या नहीं..
-योगेश'योगी'
12.

धुंधलाती शाम से सरकती रात की हद तक ,गुजरता है कानो में कहता अनकही ,हाँ एक साया उभरता है हवाओं से ।।-योगी